Saturday, November 30, 2013

पता नहीं  .... कभी कभी जब भी अकेले में मैं अपने खाली पन के बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि शायद हम जब भी  सोचते कि हम ज़िन्दिगी के बारे में काफी कुछ जानते है पर तभी एहसास होता है कि जो भी हम सोचते और समझते हैं इस ज़िन्दिगी के बारे में सब कुछ कम है, हर मोड़ पे ये ज़िन्दिगी हमें कुछ ऐसे नए रंग और हालातो से रूबरू करवाती है जिसे देख कर हम ना केवल हैरान रेह जाते है बल्कि ये सोचने पे मजबूर हो जाते है कि अभी तक जो कुछ भी हम ज़िन्दिगी के बारे में सोचते आये है या जान पाये है। … सब कम या एकदम ही गलत लगने लगता है  …
शायद इसी का नाम ज़िन्दिगी है और यही ज़िन्दिगी है कि कही हम बस यही मान कर न बैठ जाये कि जो हमारे पास है वो हमारा ही है और हमेशा हमारा ही रहेगा, चाहे भले ही आप उससे कितना भी प्यार करते हो  …